शीराज़ा बिखर गया ( شیرازہ بکھر گیا)

جون ایلیا  کی    چھوٹی بہن شاہ زناں  نجفی کا جون کے انتقال کے بعد روزنامہ راشٹریہ سہارا میں شائع مضمون ہندی ٹرانسکریپشن کے ساتھ 

(ابو تراب نقوی)


जौन को अमरोहा से जो तअल्लुक़ और जो महब्बत थी उस का बयान करना मेरे लिए मुमकिन नहीं होंगा इस लिए कि जौन अमरोहा और हिंदुस्तान की याद ही में घुल घुल कर ख़त्म हुआ । उसे अपना ख़ानदान, अपना वतन, अपने अज़ीज़, यहाँ के रस्म ओ रिवाज , यहाँ के खाने पीने से इश्क़ था और कराची जाने के बाद वो इन सब की याद में इतना बेताब रहा कि बयान से बाहर है । हमारे चार भाई थे और मैं उन भाइयों की सबसे छोटी बहन थी । जौन को मुझसे ख़ास लगाव था , ज़ाहिर है बहनो को तो भाइयों से महब्बत होती ही है । लेकिन हम दोनों के दरमियान बोहोत कुर्बत थी । 

जौन को बचपन में स्कूल जाने का शौक नहीं था और वो स्कूल जाने से घबराता था । हमारी अम्माँ का अरमान था कि जौन आला तालीम हासिल करे , ख़ास तौर पर अम्माँ अङ्ग्रेज़ी तालीम की बोहोत शौकीन थीं मगर जौन का दिल उधर नहीं लगता था और सुबह उस के उठने में एक हँगामा होता था। हमारे एक अज़ीज़ और उसके दोस्त भाई लड्डन उसे लेने आया करते थे लेकिन जौन स्कूल जाने में टालम टोल करता था । इस पर अम्माँ काफ़ी ग़ुस्सा करती थीं लेकिन बाबा हमेशा कहा करते थी कि देखना जौन बोहोत पढ़ेगा और बोहोत क़ाबिल बनेगा । 

जौन को अमरोहा के हमारे ज़माने के खेल बोहोत पसंद थे मसलन अत्ति बत्ती तलीलयो (??) का शौक़ था , गुल्ली डंडे का शौक़ था, दरगाह शहविलायत में शाम को जाने और वहाँ खेलने का उसका ख़ास तरीक़ा था , वो शाम को दरगाह निकल जाता था। ये तमाम बातें अम्माँ को बोहोत परेशान करती थीं कि मेरा ये बच्चा बोहोत नालायक़ है । उस के अलावा बड़े भाई (रईस अमरोहवी) , मँझले भाई (सय्यद मोहम्मद तक़ी ) और मँझले भाई ( मोहम्मद अब्बास ) सब को पढ़ने का शौक़ था । इन सब भाइयों की उसके बारे  में मुत्तफिक़ा राये थी कि जौन पढ़ने लिखने के मुआमले में बोहोत ही नालायक़ है । लेकिन उसके बाद जौन ने जो पढ़ना शुरू किया तो अम्माँ ये कहने लगीं कि "जौन लिल्लाह अब किताब छोड़ दे, अब पढे मत तेरी सेहत ख़राब हो जाएगी "। लेकिन जौन रातों को पढ़ता रहता था । 

एक मर्तबा बड़े भाई (रईस अमरोहवी ) जब जौन तक़रीबन एक साल का था तो उसे गोद में लेकर ईदगाह की तरफ़  चले गए । वहाँ जाकर बड़े भाई शेर ओ शाएरी में मशग़ूल हो गए और फिर जौन को वहीं छोड़ कर घर आ गए । अम्माँ ने पूछा "अरे अच्छन (रईस अमरोहवी) जौन कहाँ है ? बड़े भाई ने चौंक कर कहा ," मैं तो उसे ईदगाह छोड़ आया । अलग़रज़ ईदगाह पोहंचे तो जौन वहाँ लेते हंस रहे थे ।

जौन का कहना था कि मैं ज़िंदगी में  फिर कभी इतना नहीं हँसा जितना पैदाइश के बाद क़हक़हा लगा कर हँसा था । ये हमारे घर वालों का भी कहना था कि जौन पैदाइश के बाद बोहोत ज़ोर से हँसा था । मगर उसकी ज़िंदगी इंतेहाई उदास और मायूस गुज़री , उस का सब से बड़ा ग़म तो ये था कि वो अमरोहा से छुट गया , इन तमाम चीजों का असर उसकी शएरी और सेहत पर पड़ा ।

हर मर्तबा वो जब अमरोहा आता तो अपनी सरज़मीन को चूमता।उसे अमरोहा से अजीब तरह की अक़ीदत थी और वो चाहता कि अमरोहा की हर जगह और हर कोने पर जाए ।वो दिन दिन घूमता था और मैं ग़ुस्सा करती थी कि जौन तू इतना मत घूम , थक जाएगा , तेरी तबीयत ठीक नहीं है लेकिन वो नहीं मानता था और कहता कि तू मेरे ऊपर पाबंदी मत लगाया कर । मैं अपने चार भाइयों में सब से छोटी और इकलोती बहन थी । इसलिए जौन से तीन साल छोटी होने के बावजूद मुझे इस बात के लिए नहीं टोका गया कि मैं जौन से तू से क्यूँ बोलती हूँ। 

 जौन को भी मेरा तू से बोलना पसंद था । अक्सर जब कभी मैं उस के साथ किसी नशिस्त में जाती और उस के तअल्लुक़ से तुम का लफ़्ज़ इस्तेमाल करती तो वो मुझे वहीं डांट देता कि ये ग़लत बात है तुम यहाँ तमीज़ तहज़ीब मत इस्तेमाल करो । आज उसकी यही सब बातें याद आ रही हैं और बेचैनी हो रही है । काश हम दोनों एक मर्तबा मिल लेते । मैं दोहा जा रही हूँ , जहां मेरी एक बच्ची है । प्रोग्राम बना था कि जौन दोहा आयेगा और हम दोनों वहाँ मिल लेंगे । 

जौन जब यहाँ आता तो तमाम अज़ीज़ों से , ख़ानदान वालों से , मेरी बेटियों और दामादों से इस तरह मिलता और उन के साथ खेलता था जैसे कोई बच्चा हो । इसलिए कि वो उदासियाँ , वो तड़प , वो बेचैनी और वो उदासियाँ जो उसे वहाँ महसूस होती थीं उस को वो यहाँ पूरी तरह भुला कर एंजॉय करता था । दिल्ली में मेरी बेटी के घर वो कहता था कि मैं उस रुख़ से बैठना चाहता हूँ जिधर से अमरोहा की हवा आती हो । अमरोहा में गर्मी में बड़े बड़े सहन वाले घरों में छिड़काओ होता था । पलंग बिछे हुए हैं । मिट्टी के घड़े रखे हुए हैं , ये माहौल जौन को पसंद था और वो यहाँ दिल्ली में होता तो ये माहौल पैदा करने के लिए शोर मचाता । कहता था टैरिस पर छिड़काओ करो । कुर्सियाँ डालो , मेरी कुर्सी का रुख़ अमरोहा की तरफ़ करो । वो अमरोहा के तमाम मनाज़िर को दोहराना चाहता । अमरोहा में न सिर्फ़ रिशतेदारों बल्कि हर क़िस्म और हर तरह के लोगों से वो क़रीब था । सबज़ी वाले , रिक्शे वाले , सब उसके दोस्त थे । ये लोग जब अजून अमरोहा आता तो उससे पूछते कि मियां जौन कैसे हो , इतने दिन से कहाँ थे । अमरोहा की ज़ुबान से उसे बोहोत लगाव था और वो उसी का इस्तेमाल चाहता था । 

हम लोग अगर कभी ये कहते कि खाना बना लो तो वो नाराज़ हो जाता था कि तुम लोग इस तरह क्यूँ बोलने लगे । खाना बनाया नहीं जाता , खाना पकाया जाता है । तुम लोहार बढ़ई की तरह चीज़ें बनाने वाले नहीं हो । ये बातें उस वक़्त अजीब लगती थीं । ग़ैर मुताल्लिक़ लोग उस के बारे में सोचते थे कि ये शख़्स पागल है । बच्चे कहते थे कि ये किस तरह के ऊल जलूल आदमी हैं । आज जौन की ये यादें हैं  और मैं हूँ । हमारा जो भरा पुरा घर था उसका शीराज़ा बिखर गया । 

शाहज़नाँ नजफ़ी

No comments:

Post a Comment