कॉफ़ी, किताब और कशमकश


- ये लो ठंडी हो जाएगी वरना
ये कहते हुये कॉफ़ी का कप उसकी तरफ़ बढ़ा दिया। उसका ध्यान पास में मुंडेर पर रखे  पानी के बर्तन की तरफ़ था जिससे एक कौवा पानी पीने की कोशिश कर रहा था । उस दिन इंडियन कॉफ़ी हाउस में ज़्यादा भीड़ नहीं थी । बराबर वाली मेज़ पर एक अंकल अखबार पढ़ रहे थे । वो अखबार और उसकी सुर्खियों के साथ खोये हुए थे  । उनकी कॉफ़ी में से धुआँ धीरे धीरे हल्का हो रहा था। मेरे कहने पर उसका ध्यान टूटा।
- हम्म् तुम पियो मैं लेती हूँ अभी
उसने रूखे से लहजे में कहते हुये अपने बैग से किताब निकली और उसके पन्ने पलटने लगी। एक पन्ना जो उसने मोड़ रखा था उसे पढ्न शुरू कर दिया
- मैं तुमसे बात करने के लिए आया हूँ और तुम किताब में बिज़ि (busy ) हो
 मैंने भी झुँझलाते हुए कहा
- हम्म बोलो!
उसने बेदिली से किताब बंद करते हुए मुझसे कहा। उसकी कॉफ़ी का धुआँ भी धीरे धीरे कम हो रहा था ।
- मैं समझ नहीं पा रहा हूँ की आखिर तुम्हारे बर्ताव में एकदम से इतना चेंज (change)  क्यूँ आ गया
मैंने हैरानी से उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा
- नहीं तो ! कहाँ चेंज (change)  आया है ?
उसने ऐसे जवाब दिया की जैसे कुछ हुआ ही न हो और सबकुछ पहले की तरह अच्छा चल रहा हो । ये कहते हुए वो फिर किताब की तरफ़ देखने लगी
- ठीक है । तुम किताब ही पढ़ो
मैंने चिढ़ते हुए कहा। वो ऐसा दिखाना चाह रही थी जैसे कुछ हुआ ही न हो । मगर मैं एहसास कर सकता था । कुछ तो ऐसा हुआ है कि जिसकी वजह से वो अप्सेट (upset)  थी मगर जताना नहीं चाह रही ।
- संध्या! तुम्हारा ये बिहेव्यर (behaviour) मुझे तंग कर रहा है
मैंने उसका हाथ थामते हुए कहा । उसकी कॉफ़ी से अब धुआँ उठना बंद हो गया था ।
- अरुण! मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि जो हुआ है वो तुम्हें कैसे बताऊँ ?
ये कहते हुये उसकी आँखों झलक उठीं
- वही तो मैं जानना चाहता हूँ ?
मैंने तेज़ लहजे में कहा
- तुम्हें मुझे भूलना होगा! Please forget me!(मुझे भूल जाओ)
उसने बड़े सख़्त लहजे में कहा
- What?!! क्या हो गया है तुम्हें? ये क्या कह रही हो?
मैंने झुँझलाते हुए कहा। अंकल जो अख़बार में खोये हुए थे हमारी तरफ़ देखने लगे।
- समझने की कोशिश करो । अब हम एक साथ नहीं रह सकते । हमे जुदा होना होगा ।
ये कहते हुए उसकी आँखों में आँसू भर आए। रुंधी हुए आवाज़ में वो ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी।
- मगर कोई रीज़न (reason) ? ऐसे कैसे कर सकती हो तुम?
मैंने मायूसी भरे लहजे में कहा
- कोई रीज़न ( reason ) नहीं है। We have to do this! ( हमें यह करना ही होगा)
ये कहकर वो वहाँ से जाने लगी।
- संध्या!! संध्या!! मेरी बात सुनो प्लीज़!!
मैं उसकी तरफ़ तेज़ी से बढ़ा और उसका हाथ थाम लिया! वहाँ बैठे सभी लोग हमारी तरफ़ देख रहे थे।
-अरुण प्लीज़! तमाशा मत करो!
उसने बड़े रूखे अंदाज़ में कहा था । मैंने उसका हाथ छोड़ दिया और वो तेज़ी से सीढ़ियों से नीचे चली गयी । मैं वही पड़ी कुर्सी पर बैठ गया । मैं एक साथ दो भाव बर्दाश्त कर रहा था । एक दुख और हैरानी । कल तक एक दूसरे के साथ जीने मरने के वादे करने वाली लड़की को अचानक क्या हो गया । मैंने उसे कई बार फोन किया मगर उसने कोई जवाब नहीं दिया । और एक दिन वो कारण पता चल ही गया । मेरे दोस्त उत्कर्ष ने फोन करके मुझे वो बताया जिसे सुनकर ख़ुद को संभाल पाना बोहोत मुश्किल था । संध्या मर चुकी थी। उसे ब्रेस्ट कैंसर ( breast cancer ) था । और इसी लिए वो मुझसे दूर जाना चाहती थी । उसने मेरे साथ अपने सुख तो बांटे और अपने दुख अपने लिए चुने । और मैं इतने दिन इसी कश्मकश में जीता रहा कि आखिर उसने ऐसा क्यूँ किया !!!

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