इररेलिवेंट ग़ालिब दोबारा

माशूक़ के पैरों के चुंबन से लेकर सर दबाने तक सारे मज़मून ग़ालिब ने नज़्म कर दिये । अपने सारे दुख दर्द भी बड़ी खूबसूरती से बयान किए हैं शाएरी में । दीवान ए ग़ालिब पढें तो पता चलेगा ग़ालिब दिल के मरीज़ भी थे । इसी लिए हल्के दर्द की शिकायत से तंग आकार उन्होने ये सर्वप्रचलित शेर लिखा डाला । अर्ज़ किया है ...

दिल ए नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है

पूरी संभावना है कि ग़ालिब ने मीना बाज़ार के आस पास साँडे का तेल बेचने वाले हकीमी शोदों को अपना हाल सुनाया हो और उन्होने ग़ालिब को कुमाऊँ की किसी पहाड़ी जड़ीबूटी का नुस्खा भी दिया हो । मगर फिर भी ग़ालिब को फ़ायदा न हुआ और वो अपने दिल से ही पूछते रहे ।

अब उस ज़माने में दिल के डॉक्टर तो होते नहीं थे जो ईसीजी करके पता लगाते कि दर्द गैस का है या दिल की बीमारी । लेकिन दिल के डॉक्टर इतने महंगे हैं कि ग़ालिब किसी तरह डाइगनोसिस अफ़ोर्ड न कर पाते । शराब भी मेरठ से उधार मंगाते थे ।

तो जनाब नतीजा ये निकला कि अब आपको चिंता की ज़रूरत नहीं । कभी दिल में दर्द की शिकायत हो तो ग़ालिब का शेर पढ़ने की बजाए किसी अच्छे दिल के डॉक्टर के पास दौड़ें मगर याद रहे कि आपकी जेब (जैब) बहुत भारी होनी चाहिए । शेर फिर से अर्ज़ है ....

दिल ए नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है ...

(अबू तुराब)

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