रात तो बुझ गयी मगर जाना

 रात तो बुझ गयी मगर जाना
देर तक सुबह के उजाले में
मेरे बिस्तर पे रात जलते हुए
तुमने जो करवटें बिखेरी थीं
अब भी वो करवटें मचल रही हैं
गर्म आहें अभी भी जल रही हैं
और मेरी सांसें तेज़ चल रही हैं
रात तो बुझ गयी मगर जाना...
(अबू तुराब)


  رات تو بجھ گئ مگر جاناں
دیر تک صبح کو اجالے میں
 میرے بستر پہ رات جلتے ہوئے
 تمنے جو کروٹیں بکھیری تھیں
 اب بھی وہ کروٹیں مچل رہی ہیں
گرم آہیں ابھی بھی جل رہی ہیں
اور مری سانسیں تیز چل رہی ہیں
رات تو بجھ گئ مگر جاناں۔۔
 ابو تراب

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