कोई दर्द आशना नहीं

पहला भाग

चाय का कप हाथ में पकड़े ख़ामोश बैठे रहना और बैठे बैठे सोचते रहना । उसके दिन का ज़्यादातर हिस्सा बस इसी तरह गुज़रता । कहने को शायर मगर एक भी ग़ज़ल काग़ज़ पर नहीं उतरती। सिर्फ़ बैठे बैठे तसव्वुर के कैनवास पर ऊट पटांग तस्वीरें बनाते रहना और फिर उन अधबनी, आड़ी तिरछी तसवीरों को मिटाकर नयी तस्वीरें बनाना। इसी तरह सुबह को दोपहर और दोपहर को शाम कर देना । कहने को तन्हा तन्हा मगर अपने आप से बातें करने में इतना मगन कि किसी को उसके तन्हा होने का एहसास तक न हो। दिन भर लोगों के बीच भीड़ में बैठे रहना मगर फिर भी न किसी से बात करना न ही किसी से मिलना जुलना। बिलकुल अजीब सा किरदार है वो। अपनी कहानी का अकेला किरदार शायद। मैंने तो कभी उसे किसी से इस तरहा मिलते बात करते नहीं देखा। हाँ थोड़ी बहुत किसी साथ के स्टूडेंट से बात कर ली तो उसे बात करना नहीं कहेंगे। यूं हाए हेलो करना और हाल चाल पूछ कर चलो फिर मिलेंगे कहकर अलग हो जाना । ये कोई बात करना या समाजी होना तो नहीं होता। इसी लिए मैंने उसे अपनी कहानी का तन्हा किरदार कहा । रोज़ कैम्पस में दिखता है मगर मैंने कभी भी उससे बात करने की कोशिश नहीं की। मैं यूनही उसे दूर से देखता हूँ । कभी कभी मुसकुराता हुआ और कभी बहुत गंभीर । इंसानी जज़्बात का बेहद कमाल का तालमेल । वैसे भी कोई कहने को कहे मगर मैं नहीं मानता। हम कितने ही ख़ुश क्यूँ न दिखाई देते हों मगर कहीं न कहीं ग़म के भाव चेहरे पर दिख ही जाया करते हैं । मगर कुछ लोग इसमे भी अदाकारी कर जाते हैं । अंदर से टूटे हुए, दुखी, रोता हुआ दिल मगर होंटों पर मुस्कुराहट सजी। शायद वो भी अदाकारी करता हो। मगर मैंने उसकी मुस्कुराहट में एक अजीब से मासूमियत देखी है। ऐसी जैसे किसी मासूम बच्चे की मुस्कुराहट में दिखाई देती है। बिलकुल सच्ची । बनावट से ख़ाली। और इसी तरहा उसका गंभीर चेहरा भी उसके दिल की तस्वीर दिखाता है। माथे पर पड़ी सिलवटें ऐसी जैसे कोई बहुत गहरी बात सोच रहा हो या तसव्वुर के काग़ज़ पर कोई गंभीर ग़ज़ल लिख रहा हो। 

 

दूसरा भाग

आज बहुत दिनों बाद उसको कैम्पस में देखा । मुरझाई हुई सूरत और सवाली आँखें । वहीं अपने पसंदीदा कोने में चाय का कप लिए गुमसुम बैठा । ऐसे लग रहा था जैसे हजारों बरस की क़ैद काटकर कोई बाहर आया हो और बाहर की दुनिया से अंजान हो गया हो । या जैसे कोई अपने अंदर इतना ज़्यादा उतर गया हो कि उसे बाहर से कोई मतलब ही न रहे। चाय की धीमी धीमी चुसकियाँ और इधर उधर मंडराती आँखें । जैसे कोई बच्चा भीड़ में गुम गया हो और अपने पापा की उंगली दोबारा पकड़ने के लिए छटपटा रहा हो मगर वो बच्चा रोता बिलखता हुआ दिखाई नहीं देता। छटपटाहट तो है मगर एक बहुत गहरा सुकून भी है जो सामने वाले को कनफ्यूज़ कर देता है । "हेलो अज़हर!" ओह हेलो तुराब भाई! कैसे हैं? "मैं ठीक हूँ यार! तुम बताओ कैसे हो और कहाँ ग़ायब हो गए थे?" सवाल पूछ कर मैं चुप हो गया मगर वो बेचैन हो गया । ऐसे जैसे किसी ने कोई बहुत मुश्किल सा सवाल पूछ लिया हो । ऐसा सवाल जिसका जवाब तो पता हो मगर जवाब देना न चाहता हो । ... जी बस यूंही। घर चला गया था ज़रा कुछ दिन के लिए। "ओह अच्छा! बढ़िया है! और बताओ क्या चल रहा है?" वो बात करना चाह भी रहा था मगर चाह भी नहीं रहा था कि किसी से कुछ बोले । मगर मैं था कि सवाल किए जा रहा था। "जी कुछ खास नहीं बस ऐसे ही बैठा था। आज बस एक ही क्लास हुई तो अब फ़्री हूँ । कुछ ख़ास करने को भी नहीं है। " ये सब बोलते हुए लग रहा था उसके होंट और भारी हो गए हैं । चेहरा और ज़्यादा गंभीर और मुरझाया हुआ। शायद क्लास न होने से दुखी था। क्लास के बहाने भी कुछ दिल बहल जाता है । और क्लास न हो तो बहुत बोरिंग सा लगता है सब। उसके दोस्त भी तो नहीं हैं ज़्यादा। ज़्यादा क्या दोस्त हैं ही नहीं । मुझे जवाब देकर उसने चेहरा फिर उसी तरफ़ घूमा लिया था। मुझे भी क्लास के लिए जाना था । उसको बाय बोलकर मैं भी चला गया। कभी कभी इस लड़के में किसी बड़े दर्दनाक नावेल का हीरो नज़र आता है । उलझा हुआ, गंभीर, उदास, गहरी सवाली आँखें मगर बाहर से दिखता हुआ अथाह ठहराओ । ऐसा नहीं कि वो हमेशा ऐसे ही दिखाई देता है । वो कभी कभी मुसकुराता हुआ भी दिखता। मंद से होंटों को हल्का सा हिला देने वाली मुस्कुराहट । मगर आँखें वही गंभीर। किसी की मुस्कुराहट की सच्चाई देखनी हो तो मुसकुराते वक़्त उसकी आँखों में झांकना चाहिए। कोई बहुत बड़ा अदाकार ही होगा जो आँखों से भी अदाकारी कर पाता है वरना ज़्यादातर आँखें अंदर का आईना होती हैं । जिनमे कभी धुंधला तो कभी साफ़ मगर सच दिखाई दे जाता है । उस थोड़ी से देर की बातचीत में मैंने उसकी आँखों झांककर उसका दिल पढ़ने की कोशिश की। और काफ़ी कुछ पढ़ लिया.... 

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