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Showing posts from November, 2014

रंगों की राजनीति

रंगरेज़ की डिब्बियों से निकल रंग कब राजनीति का हिस्सा बन गए इसका आभास वर्णांध लोगों को न हुआ हो तो इसमे हैरत की कोई बात नहीं । लाल, हरा , पीला, केसरया और बसंती सब विभिन्न विचारधाराओं की रंगाई पुताई में इस्तेमाल होते रहे हैं । हैरत की बात तो ये है कि आँखों को भाने वाले ये रंग लोगों की घबराहट का कारण भी बनते हैं । किसी किसी की आँखें हरा देखकर चौंधिया जाती हैं तो किसी की केसरया । कुछ लोगों को लाल और बसंती भी फूटी आँख नहीं भाते । राजनीति रंगलीला भी है ।

धर्म

धर्म एक ऐसा शब्द जिसके सुनते ही हमारे हृदय में एक आलोकिक अनुभूति का आभास होता है धर्म यदि मानव के उद्धार के लिए है तो निश्चय ही इसका पालन करना चाहिए यदि धर्म मानव जाति के लिए खतरा बन जाए तब क्या किया जाए इसका उत्तर कोई नहीं देता..

ढइयाँ फोड़

"हम लोग बचपन में एक खेल खेला करते थे जिसे हमारे यहाँ ढइयाँ फोड़ कहते हैं । इसमे दो टीमें होती हैं दोनों टीमों को एक एक करके छोटी छोटी गिट्टियों से बनी मीनार को गेंद से मारके गिराना और फिर बनाना होता है । इस दोरान विरोधी टीम मीनार दोबारा बनाने से रोकने के लिए दूसरी टीम के लड़कों को गेंद से मारती है । यदि लड़का मीनार बना दे तो वही टीम फिर मौका पाती है और दिये गए समय में न बना पाये तो दूसरी टीम को खेलने का मौका मिलता है । यही क्रम बार बार चलता रहता है जब तक लड़के थक न जाएँ । मगर खूबी ये है की दोनों टीमों को ढइयाँ फोड़ने और बनाने का बराबर मौका मिलता है। मगर देश की राजनीतिक स्थिति पर चिंतन करते समय इस खेल के वर्णन का क्या औचितत्य है ? " - अज्ञात