क़ानून से बड़ा मैं!

आदिकाल से अब तक, अपने हठ को कभी हटने नहीं दिया । मैंने अपने अस्तित्व को शक्ति के द्वारा मनवाया । मेरी शक्ति भीड़ में है । मेरे मानने वालों में है । मेरे ऐसे मानने वाले जो मेरे एक इशारे पर मर भी सकते हैं और मार भी सकते हैं । मैंने हर दौर में क़ानून और संविधान को धता बताया । क़ानून और संविधान का अस्तित्व केवल इतना है की उसे किताबों में छापा जाता है और पढ़ा पढ़ाया जाता है । मैं किसी क़ानून को नहीं मानता। मेरा कहा क़ानून है और मेरा लिखा संविधान है । मैंने अपने क्षेत्र का सर्वेसर्वा हूँ । वहाँ मेरा राज चलता है । किसकी हिम्मत जो मेरे रास्ते में आए। मेरे इलाक़े में मेरा क़ानून है जिसका पालन मेरे मानने वाले करते और कराते हैं । मैं चाहे जिसको आने दूँ चाहे जिसको न आने दूँ । ये मेरी मर्ज़ी पर निर्भर करता है । क़ानून! हा हा हा ....... क्या कहा? क़ानून ? क़ानून मैं हूँ ! मैं क़ानून बनाने वाला और मैं ही तोड़ने वाला । क़ानून से बड़ा मैं हूँ !

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