Skip to main content

Posts

Showing posts from December, 2015

ज़िन्दगी (زندگی)

Edvard Munch - Wikipedia زندگی یہ زندگی یہ مری زندگی ہاں یہ مری زندگی فقط موت کا پیشخیمہ ہے ज़िन्दगी ये ज़िन्दगी ये मेरी ज़िन्दगी हाँ ये मेरी ज़िन्दगी फ़क़त मौत का पेशखेमा है!

कोहरा

बादल से छने धुएँ के गोले फैलते शहर में सड़कों से मिलते सफ़ेद धुएँ से लिपी पुती सड़कें आँखों पर पर्दे सी चादर धुएँ की गाड़ियों की बत्तियों पर जमी धुएँ की गर्द कुछ भी न दिखाई दे कुछ भी न सुझाई दे कभी लगे जीवन सा कभी मृत्यु ले आए कभी सुख की अनुभूति कभी दुख बनके छा जाए सफ़ेद , घना , आँखों पर पर्दे सा कोहरा

कंबल

गुडमुड़िया बनी पत्थर सी जमी मूरत थी या बूढ़ा था खुली सड़क के सँकरे से फुटपाथ पर हाथ मल - मल के गर्मी निकलता बीड़ी थी या मुँहसे उबलता कोहरे का धुआँ सिमटता सिकुड़ता दोनों हाथों से समेटे छत्तीस छेदों वाला कंबल छत्तीस छेदों वाले कंबल से छनती हवा तेज़ नुकीली कील सी बदन में चुभती सिहरन ठिठुरन बदन में बिजली सी कौंदती साएं सी सर सर करतीं गाड़ियाँ हवा चीरती शोर करती हवा फुटपाथ पर धकेलती फैलती हवा में खुद को समेटता दोनों हाथों से थाम के लपेटता बूढ़ा और छत्तीस  छेदों वाला कंबल

मुझ से मैं

हर बात में टांग अड़ाते हो तुम खुद को ज्यादा बनते हो ये ज्ञान व्यान तुम तो छोड़ो तुम तो उल्लू के चरखे हो  ये धर्म वर्म पे तंज़ वंज़ क्यूँ इतना काबिल बनते हो? ये बातें वातें बड़ों की हैं और तुम बुद्धि से बच्चे हो भगवान खुदा को मानो तो? विज्ञान की बातें जानो तो? क्या खुद से भी कुछ सोचा है ? जो पढ़ते हो बक देते हो क्या बुद्धिजीवी कहलाना है? पत्थर पे कलम चलाना है ? क्या सब कुछ दिल से कहते हो ? या यूंही सच्चे बनते हो ? तुम बनने आए कवि बड़े अब तक हो एक ही जगह खड़े जो नहीं हो वैसा बनना क्या तुम जैसे भी हो अच्छे हो !

उमंगें फीकी फीकी सी

उमंगे फीकी फीकी सी ग़ज़ल भी सीधी सादी सी हसी होंटों प रूखी सी नमी आँखों में हल्की सी शफ़क़ का रंग हल्का सा मगर है शाम काली सी मेरा एहसास बोझिल है हवा में भी है ख़ुनकी सी मेरी आँखों में ग़ुस्सा है तेरी सूरत है भोली सी बचा लीजे ज़रा नज़रें मेरी नीयत है बहकी सी तेरा चेहरा मेरी आँखें अदा दिलकश सी प्यारी सी वो चेहरा भी तो साकित है नज़र भी ठहरी ठहरी सी करोगे सीमबर कबतक ये बातें बहकी बहकी सी

अब कूच करो मंज़िल की तरफ़

अब बोहोत हुई ये बेकारी अब कूच करो मंज़िल की तरफ़ तुम देख चुके दुनिया सारी अब अब कूच करो मंज़िल की तरफ़ तुम नाम ओ निशान बना भी चुके शोहरत के मकान बना भी चुके तुम्हें जान चुकी दुनिया सारी अब कूच करो मंज़िल की तरफ़ बस इल्म ओ अदब का ढोंग हुआ जीना भी ग़ज़ब का ढोंग हुआ अब खेल नया और नई पारी अब कूच करो मंज़िल की तरफ़ सब बातें वातें हो भी चुकीं बेखाबी की रातें हो भी चुकीं अब छोड़ दो दिल की मक्कारी अब कूच करो मंज़िल की तरफ़ ये अमन ओ अमान के ख़ाब भले ये राहत ए जान के ख़ाब भले पर सच तो है दिल की बेज़ारी अब कूच करो मंज़िल की तरफ़ सब अबू तुराब को जान गए सब उसके हुनर को मान गए वो हो भी चुका अब बाज़ारी अब कूच करो मंज़िल की तरफ़

( میں نے کیا دل میں حسرتیں رکھیں ) मैं ने क्या दिल में हसरतें रक्खीं

میں نے کیا دل میں حسرتیں رکھیں اسنے مجھسے عداوتیں رکھی मैं ने क्या दिल में हसरतें रक्खीं उसने मुझसे अदावतें रक्खीं اسنے اک لمحہ وصال کی شرط چند خاموش ساعتیں رکھیں उसने इक लम्हा ए विसाल की शर्त चंद ख़ामोश साअतें रक्खीं اسنے خود کو سمیٹ کر رکھا میرے حصہ میں وسعتیں رکھیں उसने ख़ुद को समेट कर रक्खा मेरे हिस्से में वुसअतें रक्खीं بات کی لمحہ ہمیشہ کی اور پھر اسکی بھی حدیں رکھیں बात की लम्हा ए हमेशा की और फिर उसकी भी हदें रक्खीं اسنے کل رات میرے پہلو میں اپنی معصوم کروٹیں رکھیں उसने कल रात मेरे पहलू में अपनी मासूम करवटें रक्खीं کیا خدا رشتہ دار تھا میرا جب بھی رکھیں شکایتیں رکھیں क्या ख़ुदा रिश्तादार था मेरा जब भी रक्खीं शिकायतें रक्खीं اسکو جانا متاع لا حاصل ہم نے دل میں نہ خواہشیں رکھیں उसको जाना मता ए लाहासिल हम ने दिल में न खाहिशें रक्खीं ہم نے ہر لمحہ اپنے پیروں میں بے ارادہ مسافتیں رکھیں हम ने हर लम्हा अपने पैरों में बे इरादा मसफ़तें रक्खीं

بیوقوفی کی حدیں

تم نے سنا ہے بیوقوفی کی کچھ حدیں بھی رکھی گئ ہیں۔ کیا؟ بیوقوفی کی حدیں؟ مگر کیوں؟ کسنے مقرر کییں؟ تم سے قبل کے بیوقوفوں نے ہی کی ہونگی۔ کی ہونگی سے کیا مراد ہے؟ کیا تمہیں صحیح نہیں پتا؟  پتا تو ہے مگر یہ یقین نہیں کی جو کچھ مجھے پتا ہے وہ درست بھی ہے یا نہیں۔خیر مدعا تو یہ ہے کہ بیوقوفی کی حدیں ہوتی ہیں اور ان حدوں کے پار کرنے والے کو پاگل کہتے ہیں۔ کیا مطلب تم مجھے پاگل کہہ رہے ہو؟ نہیں تو میں نے تو یونہی بتایا۔ اب تم خود ہی بات کو اپنے اوپر لے جا رہے ہو تو اس میں میرا کیا قصور۔ میں تو صرف عمومی راے بتا رہا تھا۔ مگر یہ عمومی راے کیسے ہوئ؟ کیا سارے عوام بھی بیوقوف ہیں جو انہوں نے یہ راے قائم کر دی ہے؟ ھممم! بات تو قابل غور ہے۔ مگر پھر بھی مدعا تو یہ ہے کی بیوقوفی کی کچھ حدیں ہوتی ہیں اور ان حدوں کو پار کرنا پاگلپن ہی ہوتا ہے۔ بڑے فلسفی اور مفکر بھی اس بات کو بڑے وثوق سے کہتے اورلکھتے ہیں۔ کیا مطلب؟ فلسفی اور مفکر اس بات کے داعی کیسے ہو گئے کہ بیوقوفی کی کچھ حدیں ہوتی ہیں ۔ کیا انہوں نے کبھی ان حدوں کا پار کیا ہے جس سے وہ ان حدوں کا تعین کر سکیں؟ اماں ہاں! بات تو یہ بھی ٹھیک ہے۔ م