Skip to main content

Posts

Showing posts from March, 2016

मुझे मत बताना - परवीन शाकिर (”مُجھے مَت بتانا“ - پروین شاکر)

मुझे मत बताना कि तुम ने मुझे छोड़ने का इरादा किया था क्यूँ और किस वजह से ? अभी तो तुम्हारे बिछड़ने का दुख भी कम नहीं हुआ अभी तो मैं बातों के वादों के शहर ए तिलिस्मात में आँख पर ख़ुश गुमानी की पट्टी लिए तुम को पेड़ों के पीछे दरख्तों के झुंड और दीवार की पुश्त पर ढूँढने में मगन हूँ कहीं पर तुम्हारी सदा और कहीं पर तुम्हारी महक मुझ प हसने में मसरूफ़ है मैं अभी तक तुम्हारी हंसी से नबर्द आज़मा हूँ और इसी जंग में मेरा हथियार अपनी वफ़ा पर भरोसा है और कुछ नहीं इसे कुंद करने की कोशिश न करना मुझे मत बताना - परवीन शाकिर مُجھے مَت بتانا کہ تم نے مُجھے چھوڑنے کا ارادہ کِیا تھا تو کیوں اور کِس وجہ سے ؟؟ ابھی تو تمہارے بچھڑنے کا دُکھ بھی کم نہیں ھُوا ابھی تو میں باتوں کے وعدوں کے شہرِ طلسمات میں آنکھ پر خوُش گمانی کی پٹی لیے تم کو پیڑوں کے پیچھے درختوں کے جُھنڈ اور دیوار کی پُشت پر ڈھوُنڈنے میں مگن ھُوں کہیں پر تمہاری صدا اور کہیں پر تمہاری مہک مجھ پہ ھنسنے میں مصروف ھے. میں ابھی تک تمہاری ھنسی سے نبرد آزما ھُوں اور اِسی جنگ میں میرا ھتھیار اپنی

Ghazal on Holi

  दिल से भाते हैं मुझे सब इस्तेआरे रंग के ज़िंदगी भी कटती जाती है सहारे रंग के دل سے بھاتے ہیں مجھے سب استعارے رنگ کے زندگی بھی کٹتی جاتی ہے سہارے رنگ کے रोशनी बनकर तेरी जानिब खिंचा जाता हूँ मैं सादा लौ हूँ पर समझता हूँ इशारे रंग के روشنی بنکر تری جانیب کھنچا جاتا ہوں میں سادہ لو ہوں پر سمجھتا ہوں اشارے رنگ کے राह में होली पे निकेलगा वो रंगोली बदन और मैं भर भर के मारूँगा ग़ुबारे रंग के راہ میں ہولی پہ نکلے گا وہ رنگولی بدن اور میں بھر بھر کے مارونگا غبارے رنگ کے ख़ूब खनकेंगी कलाईयों में धानी चूड़ियाँ ओर रगड़ खा खा के फूटेंगे शरारे रंग के خوب کھنکینگی کلائیوں میں دھانی چوڑیان اور رگڑ کھا کھا کے پھوتٹینگے شرارے رنگ کے मैंने भी देखा तो आँखों में जलन होने लगी शहर भर में आम  थे चर्चे तुम्हारे रंग के میں نے بھی دیکھا تو آنکھوں میں جلن ہونے لگی شہر بھر میں عام تھے چرچے  تمہرارے رنگ کے रक़्स होगा, मैकशी होगी, ख़ुशी होगी तुराब हर तरफ़ हर गाम पे होंगे नज़ा

नमक कम है!

कल मीर साहब अपनी बीवी से सालन में नमक को लेकर लड़ रहे थे । लड़ाई का आग़ाज़ मीर साहब की सालन में नमक के विरोध में नारेबाज़ी से हुआ । इस पर उनकी बीवी ने महिला विरोधी कहते हुए उन्हें लताड़ने की कोशिश की । पूरी गली में शोर शराबा था । पास से गुज़र रहे रिज़्वी साहब जो कि एक लोकल चेनल के पत्रकार हैं बाइट लेने के चक्कर में दीवार से गिरते गिरते बचे । मीर साहब की बीवी चिल्लाईं , " तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई सालन में नमक कम बताने की ।" मीर साहब भी इधर से दहाड़े , '' अबे जब नमक कम है तो कहूँ ना ?" उधर से बीवी भी तर्क देते हुए चिल्लाईं ,'' सारा विरोध यहीं निकलता है तुम्हारा! बराबर वाले नक़वी साहब की बीवी भी तो सालन में नमक, बल्कि मिर्चें भी कम कर देती हैं । तुमने उनका तो कभी विरोध नहीं किया? सारी अभिव्यक्ति की आज़ादी मेरे ही सामने निकलती है!" "अमां क्या अहमक़ों जैसी बातें कर रही है । नक़वी साहब से मेरा क्या मतलब । मसला हमारे घर का है तो तुमसे ही तो कहूँगा । " हाँ हाँ ! तुम्हें तो सारी खोट मुझमें ही नज़र आती है । सब ऐब मेरे ही घर में हैं। इतना

अमोढ़ा और अमरोहा का अंतर

बचपन में भी और बड़े होने के बाद भी अक्सर ये बात कानों में पढ़ती थी कि अमिताभ बच्चन के पूर्वजों का संबंध अमरोहा से था । ये बात थोड़ी अटपटी तो लगती थी । मगर बाद में थोड़ा इतिहास जाना तो यह पता चला कि यह सत्य भी हो सकता है । इसके पीछे कारण ये है कि अमरोहा जिसका इतिहास लगभग 2500 ई0पू0 बताया जाता है में विभिन्न जातियों तथा धर्मों के लोग रहते आए हैं । इन्हीं में कायस्थों का इतिहास भी पुराना है । अब चूंकि बाबू हरिवंश राय बच्चन, ( अमिताभ बच्चन के पिता ) कायस्थ थे इसी कारण शायद किसी महानुभाव ने ये पढ़ लिया हो या कोई ग़लती हो गयी हो कि इनके पूर्वज अमरोहा के थे । वैसे यह बात अमरोहा में आम तौर से नहीं कही जाती मगर कुछ लोगों यह भ्रम अवश्य है । जब मैंने हरिवंश राय बच्चन को पढ़ना प्रारम्भ किया तो उनकी विश्व विख्यात "मधुशाला'' को पढ़ने के बाद उनकी आत्मकथा पढ़ने की चेष्ठा हुई । मन में उपरोक्त लिखी बात के लिए भी उत्सुकता कौंद रही थी । उनकी आत्मकथा जो कि चार भागों में है का पहला भाग 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ'' मैंने पढ़ना शुरू किया। इस भाग में उन्होने अपने पूर्वजों के बारे मे

जौन भी एक नौजवां गुज़रा

जौन स्कूल जाने के लिए घर से तो निकलते थे मगर स्कूल नहीं जाते थे । दोस्तों के साथ खेलते फिरते थे । एक दिन उस्ताद ने बाबा शफ़ीक़ हसन एलिया से शिकायत करदी । उसके बाद जो डांट पड़ी है उसका असर जौन ने इतना ज़्यादा ले लिया की रात रात भर पढ़ने लगे और सिर्फ़ पढ़ते ही रहते थे । यहाँ तक की अम्मा को कहना पड़ गया कि "जौन अब किताबें रख दे"। मगर जौन ने तो ठान ही ली थी । और पढ़ने में जौन को इंस्पाइर करने के लिए बड़े भाई भी तो थे, रईस अमरोहवी और सय्यद मोहम्मद तक़ी । रईस पढ़ने में इतना मगन हो जाते थे कि एक मर्तबा जौन को गोद में लेके ईदगाह गए और साथ अपनी किताब भी ले गए । किताब तो वापस ले आए मगर जौन को वहीं भूल आए । दूसरे भाई के बारे में जौन ने ख़ुद लिखा है कि "मैंने इन जैसा मुतालेआ करने वाला इंसान नहीं देखा"। जौन ने पढ़ा और ख़ूब पढ़ा । मज़हब और फलसफ़ा पसंदीदा मौज़ू थे । अपने दौर में नौजवानों के पसंदीदा तरीन कम्यूनिज़्म से भी मुतास्सिर हुए । कामरेड नाज़िश अमरोहवी को कम्यूनिज़्म और सियासियात में अपना उस्ताद मानते थे । ये वो दौर था जब सियासत के अलावा, कम्यूनिज़्म, फलसफ़ा और अदब नौजवानों के