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Showing posts from April, 2016

इररेलिवेंट ग़ालिब दोबारा

माशूक़ के पैरों के चुंबन से लेकर सर दबाने तक सारे मज़मून ग़ालिब ने नज़्म कर दिये । अपने सारे दुख दर्द भी बड़ी खूबसूरती से बयान किए हैं शाएरी में । दीवान ए ग़ालिब पढें तो पता चलेगा ग़ालिब दिल के मरीज़ भी थे । इसी लिए हल्के दर्द की शिकायत से तंग आकार उन्होने ये सर्वप्रचलित शेर लिखा डाला । अर्ज़ किया है ... दिल ए नादां तुझे हुआ क्या है आखिर इस दर्द की दवा क्या है पूरी संभावना है कि ग़ालिब ने मीना बाज़ार के आस पास साँडे का तेल बेचने वाले हकीमी शोदों को अपना हाल सुनाया हो और उन्होने ग़ालिब को कुमाऊँ की किसी पहाड़ी जड़ीबूटी का नुस्खा भी दिया हो । मगर फिर भी ग़ालिब को फ़ायदा न हुआ और वो अपने दिल से ही पूछते रहे । अब उस ज़माने में दिल के डॉक्टर तो होते नहीं थे जो ईसीजी करके पता लगाते कि दर्द गैस का है या दिल की बीमारी । लेकिन दिल के डॉक्टर इतने महंगे हैं कि ग़ालिब किसी तरह डाइगनोसिस अफ़ोर्ड न कर पाते । शराब भी मेरठ से उधार मंगाते थे । तो जनाब नतीजा ये निकला कि अब आपको चिंता की ज़रूरत नहीं । कभी दिल में दर्द की शिकायत हो तो ग़ालिब का शेर पढ़ने की बजाए किसी अच्छे दिल के डॉक्टर

इररेलिवेंट ग़ालिब

उर्दू भाषा और शाएरी का दूसरा नाम है "गालिब"। शाएरी का नाम लीजे और दिमाग़ में ग़ालिब का चुगा टोपी पहने नसीरुद्दीन शाह मस्तिष्क के पर्दे पर कोड़ियाँ खेलते नज़र आने लगते हैं । किसी ने कहा था ग़ालिब उर्दू का सबसे मुश्किल कवि था । बस, ट्रक, डंपर से लेकर शौचालयों तक ये मुश्किल वाले गालिब छपे होते हैं । ख़ैर मेरा इशू यह नहीं है । मुझे तो ग़ालिब के एक शेर को लेकर कुछ बकवास करनी है । तो बात यह है कि ग़ालिब का मशहूर शेर तो आपने सुना ही होगा... जी वही तग़ाफ़ुल वाला । दरअसल वहाँ ग़ालिब अपने समय की सुस्त संचार व्यवस्था पर तंज़ सूत रहे हैं । यह वह दौर था जब डाकिया का काम कबूतर किया करते थे । या फिर "नामाबर" घौड़े पर बैठ अपने नेफ़े में नामा घुसेड़ कर ले जाते थे और सफ़र की दूरी के हिसाब से रास्ते में घौड़े बदलते थे । आजकल हम बस और ट्रेन बदलते हैं । तो चचा ग़ालिब कह रहे हैं कि हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको ख़बर होने तक अपनी महबूबा पर तो भरोसा है मगर सुस्त संचार व्यवस्था पर नहीं । मगर उस समय तो डाक विभाग था नहीं? या था? ख़ैर, अब अगर ग़ालिब के महबूबा क

तुम्हारे लिए प्रेयसी (Pour Toi, Mon Amour)

तुम्हारे लिए प्रेयसी मैं परिंदों के बाज़ार गया और एक परिंदा ख़रीदा तुम्हारे लिए प्रेयसी फिर गया फूलों की दुकान पर और एक फूल ख़रीदा तुम्हारे लिए प्रेयसी फिर मैं कबाड़खाने पहुंचा और ज़ंजीर ख़रीदी भारी भरकम ज़ंजीर तुम्हारे लिए मेरी प्रेयसी आख़िर मैं ग़ुलामों के बाज़ार पहुंचा देर तक तुम्हें तलाशता रहा पर मैंने तुम्हें कहीं नहीं पाया (कहीं नहीं) प्रेयसी - जाक प्रेवेर (फ्रेंच कवि) (हिन्दी अनुवाद = अबू तुराब नक़वी ) Pour Toi, Mon Amour - Jacques Prévert Je suis allé au marché aux oiseaux Et j’ai acheté des oiseaux Pour toi Mon amour Je suis allé au marché aux fleurs Et j’ai acheté des fleurs Pour toi Mon amour Je suis allé au marché à la ferraille Et j’ai acheté des chaînes De lourdes chaînes Pour toi Mon amour Et puis je suis allé au marché aux esclaves Et je t’ai cherchée Mais je ne t’ai pas trouvée Mon amour