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Showing posts from March, 2017

सो गयी होगी वो शफ़क़ अंदाम

आधी रात ढल चुकी है । बारिश ने मौसम को सर्द कर दिया है । किवाड़ों से छन छन के हवा के बारीक लहरें कमरे में घुसी चली आ रही हैं । टांगों पर पड़े कंबल ने सर्दी के एहसास को थोड़ा कम कर दिया है । बाहर गाड़ियों का शोर अब भी सुनाई दे रहा है । मगर ज़्यादातर गाड़ियाँ वापस लौट रही हैं । स्टीरियो पर धीमी आवाज़ में अमीर खुसरो की ख़बरम रसीदा बज रही है। माहौल की सर्दी और जज़्बात के गर्मी का मिला जुला असर मुझे घेरे हुए है । अभी यादों के दरीचे के खुलने की आहट हुई । उसकी याद अं दर दाख़िल हुई है । सोच रहा हूँ वो अब क्या कर रही होगी । शायद अपने मखमली बिस्तर पर लेटी मेरे बारे में सोच रही हो । तकिये को अपने सीने के नीचे दबाए बिस्तर पर औंधे लेटी हुई अपने दायें गाल पर ज़ुल्फों को बिखेरे हुए मेरे बारे में सोच रही होगी । या शायद कोई नावेल पढ़ रही होगी । उसे किताबों से बड़ी मुहब्बत है । मैंने जब पहली बार उसे देखा था तब भी उसके हाथ में किताब थी । और आखरी बार जब हमनें एक दूसरे को देखा था तब भी उसके हाथों में किताब थी । अलविदा कहने के बाद वो मुड़कर चलने लगी थी । बहुत दूर तक वो मुझे देखती रही । मैं भी उसे देखता

कान्हा के हसरत: मौलाना हसरत मोहानी और श्रीकृष्ण

फ़िल्म निकाह में ग़ुलाम अली द्वारा गायी गयी ग़ज़ल "चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है" ने फ़िल्म से ज़्यादा धूम मचा दी थी । लोगों को उत्सुकता हुई तो पता चला कि ये सुंदर ग़ज़ल मौलाना हसरत मोहानी ने रची थी। मौलाना हसरत मोहानी, एक स्वतन्त्रता सेनानी, एक पत्रकार, एक शायर के रूप में तो जाने जाते हैं मगर उनका एक रूप आम जानता में बहुत अधिक नहीं जाना जाता । वह रूप है मौलाना हसरत मोहानी की कृष्ण भक्ति का । भगत सिंह के मुह से भारतीय स्वांतरता संग्राम की पहचान बने "इंकेलाब ज़िंदाबाद" नारे के जनक हसरत मोहानी ख़ुद भी एक क्रांतिकारी थे । केवल 20 साल की उम्र में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के विरोध में अपनी पत्रिका "उर्दू ए मोअल्ला" में एक अनाम लेख प्रकाशित किया। सरकार ने जब लेखक का नाम जानने के लिए दबाव बनाया तो उसकी जिम्मेदार ख़ुद लेते हुए एक साल की जेल काटी । हसरत मोहानी की कृष्ण भक्ति की झलकियाँ उनकी कविताओं और ग़ज़लों के अलावा उनके व्यवहार में भी मिलती हैं । हसरत कृष्ण को "हज़रत कृष्ण अलैहिररहमा" कहकर पुकारा करते थे । हसरत की कुछ जीवनियों में यह

शब्दों से खींची तस्वीर

मैं स्केचिंग करता हूँ अक्सर । और बेहतर सीखने की कोशिश भी करता हूँ । मगर अभी इतना निपुण नहीं कि खुरदुरे काग़ज़ पर तुम्हारी तस्वीर उकेर सकूँ । मुझे लिखना आता है । वो भी बस यूंही सा । शब्दों से तुम्हारा चित्रवर्णन कर सकता हूँ । सीधे सादे मन से निकले हुए शब्दों से । सच्ची भावनाओं की महक लिए शब्द । तुम्हारे उभरे हुए माथे पर घड़ी घड़ी मटकती बालों की लट और माथे की सत्ता पर बिराजमान काजल की सलाई सी छापी हुई बिंदी । हल्के हल्के मसकारे से भरी पलकों का झुरमुट और उस झुरमुट से झलकती हल्की भूरी आँखें । कटार की नोक सी तेज़ नाक का सिरा । गुलदान में सजे मख़मली गुलाब के फूलों से उभरे हुए होंट । उन होंटों मे शिव के कंठ से ज़्यादा ज़हर भरा है । ऐसा ज़हर कि छू भर लेने पर आदमी अमर हो जाए । होंटों से नीचे दो मुहि थोड़ी तुम्हारी मुस्कुराहट को और खूबसूरत बना देती है । देखो, शब्दों से कैसी तुम्हारी तस्वीर उकेरी है । डर है कहीं कोई तुम्हें पहचान न जाए ।

एक्स्क्यूज़ मी अंकल!

आदमी के दिल और बरगद के जिन का कोई भरोसा नहीं। कभी भी किसी पर भी आ सकता है । हमारे साथ भी कुछ यूं ही हुआ। बात है 28 फरवरी सन 2017 की शाम की। रोज़ की तरह कैंटीन में खाना खाने के बाद चाय की हड़क लगी तो राहुल भय्या के स्टॉल की तरफ़ बढ़ गए। अपनी खादी की जवाहर कट के दोनों चाकों को दुरुस्त करते हुए । एक और पौन नंबर की ऐनक आँखों पर सही बिठाते चलता जा रहा था कि सामने से एक दोशीज़ा को आते हुए देखा। देखते ही दिल धक से होकर रह गया। कोई इतना मासूम और खूबसूरत चेहरा वाइज़ के सामने भी आ जाए तो ईमान भूल जाए। मेरी तो धड़कन ही क़ाबू में नहीं आ रही थी । सोने पर सुहागा ये हुआ कि मेरी उस दोशीज़ा से नज़र टकरा गयी । अब तो दिल क़ाबू में रखना ऐसा हो गया था जैसे लंगर में बिरयानी बाटनी पड़ गयी हो । मेरी चाल हल्की हुई । उसके क़दम तेज़ हुए । उसका अंदाज़ ऐसा था जैसे मेरे ही पास आ रही है । जैसे जैसे उसके क़दम बढ़ रहे थे मेरी हार्टबीट बढ़ रही थी । फिर वही हुआ कि जो होना था । वो मेरी क़रीब आई रुकी और अपने मासूम लबों को जुंबिश देते हुए बोली, " एक्स्क्यूज़ मी अंकल! ये कम्प्युटर साइंस डिपार्टमेन्ट किधर है?"