कान्हा के हसरत: मौलाना हसरत मोहानी और श्रीकृष्ण

फ़िल्म निकाह में ग़ुलाम अली द्वारा गायी गयी ग़ज़ल "चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है" ने फ़िल्म से ज़्यादा धूम मचा दी थी । लोगों को उत्सुकता हुई तो पता चला कि ये सुंदर ग़ज़ल मौलाना हसरत मोहानी ने रची थी।

मौलाना हसरत मोहानी, एक स्वतन्त्रता सेनानी, एक पत्रकार, एक शायर के रूप में तो जाने जाते हैं मगर उनका एक रूप आम जानता में बहुत अधिक नहीं जाना जाता । वह रूप है मौलाना हसरत मोहानी की कृष्ण भक्ति का । भगत सिंह के मुह से भारतीय स्वांतरता संग्राम की पहचान बने "इंकेलाब ज़िंदाबाद" नारे के जनक हसरत मोहानी ख़ुद भी एक क्रांतिकारी थे । केवल 20 साल की उम्र में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के विरोध में अपनी पत्रिका "उर्दू ए मोअल्ला" में एक अनाम लेख प्रकाशित किया। सरकार ने जब लेखक का नाम जानने के लिए दबाव बनाया तो उसकी जिम्मेदार ख़ुद लेते हुए एक साल की जेल काटी ।

हसरत मोहानी की कृष्ण भक्ति की झलकियाँ उनकी कविताओं और ग़ज़लों के अलावा उनके व्यवहार में भी मिलती हैं । हसरत कृष्ण को "हज़रत कृष्ण अलैहिररहमा" कहकर पुकारा करते थे । हसरत की कुछ जीवनियों में यह मत भी मिलता है कि वे कृष्ण को रसूल या पैग़ंबर भी मानते थे । हसरत के शब्दों में कृष्ण प्रेम और सौन्दर्य का मानव रूप थे । और यही चीज़ उन्हें कृष्ण भक्ति के रंग में रंगती थी । हसरत से किसी ने उनका धर्म पूछा तो कहा....

दरवेशी ओ इंकेलब है मसलक मेरा
सूफ़ी मोमिन हूँ इश्तेराकी मुस्लिम
(मेरा धर्म फ़क़ीरी और क्रांति है । मैं सूफ़ी मोमिन हूँ और कम्युनिस्ट मुस्लिम)

हसरत का एक और शेर उनके धार्मिक विचारों की अक्कासी करता है । वो कुछ इस तरह है ...

मसलक ए इश्क़ है परसतिश ए हुस्न
हम नहीं जानते अज़ाब ओ सवाब
(प्रेम धर्म सौन्दर्य की पूजा है । पाप और पून्य मुझे नहीं पता)
हसरत के बारे में प्रसिद्ध है कि वे अपने पास सदा मुरली (बांसुरी) रखा करते थे । न केवल इतना बल्कि हसरत अक्सर जन्माष्टमी मनाने मथुरा भी जाया करते थे । एक बार जेल में होने के कारण हसरत मथुरा नहीं जा पाया तो इसका गिला उन्होने ने अपनी एक कविता उसका गिला भी किया ।

हसरत शायर थे । यूं कहा जाए की एक सूफ़ी शायर थे । हसरत ने प्रेम और सौन्दर्य को दैवीय रूप में देखा और उसका अपनी कविताओं और ग़ज़लों में वर्णन किया । कृष्ण से उनका प्रेम अपार था। और इस प्रेम को उन्होने अपनी भाषा कविताओं और उर्दू ग़ज़लों बड़ी सुंदरता से दर्शाया है । हसरत के कविता संग्रह "कुल्लीयात ए हसरत" में ये सभी कविताएं और ग़ज़लें दर्ज हैं । जिनमे से कुछ का हिन्दी रूपान्तरण यहाँ दिया जा रहा है ।

१) मन तोसे प्रीत लगाई कान्हाई
काहू और की सूरत अब काहे को आई
गोकुल ढूंढ बृंदाबन ढूंढो
बरसाने लग घूम के आई
तन मन धन सब वार के हसरत
मथुरा नगर चली धूनी रमाई

२) मोसे छेर करत नंदलाल
लिए ठारे अबीर गुलाल
ढीठ भयी जिन की बरजोरी
औरन पर रंग डाल डाल
हमहूँ जो दिये लिपटाए के हसरत
सारी ये छलबल निकाल

३) बिरह की रैन कटे न पहार
सूनी नगरिया परी उजार
निर्दयी श्याम परदेस सिधारे
हम दुखियारन छोरछार
काहे न हसरत सब सुख सम्पत
तज बैठन घर मार किवार

४) मोपे रंग न डार मुरारी
बिनती करत हूँ तिहारी
पनिया भरन के जाय न देहें
श्याम भरे पिचकारी
थर थर कंपन लाजन हसरत
देखत हैं नर नारी

५) मथुरा कि नगर है आशिक़ी का
दम भर्ती है आरज़ू उसी का

हर ज़र्रा ए सरज़मीने गोकुल
दारा है जमाल ए दिलबरी का

बरसाना ओ नंदगाँव में भी
देख आए हैं जलवा हम किसी का

पैग़ामे हयाते जावेदा था
हर नग़मा कृष्ण बांसुरी का

वो नूरे सियाह था कि हसरत
सरचश्मा फ़रोग़ ए आगही का

हसरत की शायरी और उनकी कृष्ण भक्ति हिन्दोस्तान की उस सभ्यता की प्रतीक है जिसने दुनिया को सेकुलरिज़्म का पाठ पढ़ाया । हसरत ने कृष्ण को प्रेम का प्रतीक माना । आज भारत इसी प्रेम की कमी बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा है। हसरत होली भी बड़े जोश से खेलते थे । प्रेम के रंगों से खेली गयी होली के रंगों से रंगा हसरत का सफ़ेद कुर्ता हिंदुस्तानी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक होना चाहिए ।

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