शब्दों से खींची तस्वीर

मैं स्केचिंग करता हूँ अक्सर । और बेहतर सीखने की कोशिश भी करता हूँ । मगर अभी इतना निपुण नहीं कि खुरदुरे काग़ज़ पर तुम्हारी तस्वीर उकेर सकूँ । मुझे लिखना आता है । वो भी बस यूंही सा । शब्दों से तुम्हारा चित्रवर्णन कर सकता हूँ । सीधे सादे मन से निकले हुए शब्दों से । सच्ची भावनाओं की महक लिए शब्द । तुम्हारे उभरे हुए माथे पर घड़ी घड़ी मटकती बालों की लट और माथे की सत्ता पर बिराजमान काजल की सलाई सी छापी हुई बिंदी । हल्के हल्के मसकारे से भरी पलकों का झुरमुट और उस झुरमुट से झलकती हल्की भूरी आँखें । कटार की नोक सी तेज़ नाक का सिरा । गुलदान में सजे मख़मली गुलाब के फूलों से उभरे हुए होंट । उन होंटों मे शिव के कंठ से ज़्यादा ज़हर भरा है । ऐसा ज़हर कि छू भर लेने पर आदमी अमर हो जाए । होंटों से नीचे दो मुहि थोड़ी तुम्हारी मुस्कुराहट को और खूबसूरत बना देती है । देखो, शब्दों से कैसी तुम्हारी तस्वीर उकेरी है । डर है कहीं कोई तुम्हें पहचान न जाए ।


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