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Showing posts from May, 2017

रात तो बुझ गयी मगर जाना

 रात तो बुझ गयी मगर जाना देर तक सुबह के उजाले में मेरे बिस्तर पे रात जलते हुए तुमने जो करवटें बिखेरी थीं अब भी वो करवटें मचल रही हैं गर्म आहें अभी भी जल रही हैं और मेरी सांसें तेज़ चल रही हैं रात तो बुझ गयी मगर जाना... (अबू तुराब)   رات تو بجھ گئ مگر جاناں دیر تک صبح کو اجالے میں  میرے بستر پہ رات جلتے ہوئے  تمنے جو کروٹیں بکھیری تھیں  اب بھی وہ کروٹیں مچل رہی ہیں گرم آہیں ابھی بھی جل رہی ہیں اور مری سانسیں تیز چل رہی ہیں رات تو بجھ گئ مگر جاناں۔۔  ابو تراب

वो जो रखते थे हम इक हसरते तामीर सो है

ज़िंदगी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है । पीछे मुड़कर देखता हूँ तो  कुछ धुंधले वक़्त और उनसे जुड़ी यादें ही दिखाई देती हैं । कितनी चीज़ें वक़्त के अथाह सागर में मुझसे छूट गईं । कितने लोग मुझे बिछड़ गए । उनमे से कुछ लोग ऐसे थे कि जिनसे मिलना मेरे बस में नहीं था । और न ही उनसे बिछड़ना मेरे क़ाबू में थे । कुछ ऐसे थे जिनसे मिलने और अलग होने पर मेरा बस था । उन लोगों से जिनसे मिलने या बिछड़ने पर मेरा इख्तेयार नहीं था , उनसे जुदा होने दुख मैंने सहा है । और अब तक सह रहा हूँ । और लगता है कि इस दुख के साथ ही आगे भी जीना होगा । मगर कुछ लोग ऐसे भी मुझसे जुदा हो गए जिनपर मेरा इख्तेयार था। या ये मेरा गुमान है कि मेरा इख्तेयार था। बहरहाल.... मिर्ज़ा ग़ालिब किसके पसंदीदा शायर नहीं । ख़ासकर वो लोग जो उर्दू  शाएरी के बारे में कम जानते हैं उनके लिए मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू शाएरी का दूसरा नाम हैं ।शाएरी का ज़िक्र कीजे और जिस शख़्स  का खयाल ज़हेन में सबसे पहले आता है वो मिर्ज़ा ग़ालिब ही हैं । ग़ालिब मुझे भी पसंद हैं । ग़ालिब के कुछ शेर बहुत मासूम और सच्चे लगते हैं और जिनका मेरी ज़िंदगी से काफ़ी हद तक तअल्लुक़ है । उनही कुछ शेरों स

कर्बे तनहाई है वो शै कि ख़ुदा.......

कर्ब कहते हैं दुख को । बहुत ज़्यादा दुख, तकलीफ़। वो तकलीफ़ जो इंसान अपनी रूह में महसूस करता है । और जिसको लफ़्ज़ों में बयान करना बहुत मुश्किल होता । जौन एलिया ने बहुत ही कर्बनाक ज़िंदगी गुज़ारी है । शुरू से आख़िर तक उनकी ज़िंदगी दुख ही दुख रही है । मगर ये दुख दुनियावी चीज़ों के लिए नहीं था । ये तड़प थी अकेलेपन की तड़प, तनहाई का कर्ब । मेरे ख़याल में तनहाई को दो अलग अलग तरह से समझा और समझाया जा सकता है । आप अकेले हैं, कोई आपका दोस्त या चाहने वाला नहीं तो आप तन्हा हैं । आप के चाहने वाले हैं । आप हमेशा दोस्तों में घिरे रहते हैं मगर कोई आपको समझने वाला नहीं । कोई आपके एहसास की शिद्दत को,  आपके ख़यालों को समझ नहीं पाता । तब भी आप तन्हा हैं । और ये तनहाई पहले वाली तनहाई से ज़्यादा दुख देती है । मेरे मानना है कि इंसान कि दिली चाह होती है कि उसके समझा जाये । उसे सुना जाए । उसकी बात उसके ख़यालों पर कम से कम ग़ौर ही किया जाए अगर उनसे सहमत न भी हों तो । मगर ये सब न होने पर इंसान अकेलापन महसूस करने लगता है । उसे लगता है कि कोई भी उसे समझने वाला नहीं । वो अपनी बात तो लफ़्ज़ों में अदा कर सकता है मगर अपने एहसास को ल

लोग मसरूफ़ जानते हैं मुझे.......

मुझे अक्सर कम ही लोग मुतास्सिर करते हैं । मगर जो करते है वो बहुत गहरी छाप छोडते हैं । उन्हीं चंद लोगों में से एक जौन एलिया भी हैं । मेरे क़रीबी लोग बहुत अच्छे से जानते हैं कि मेरा जौन एलिया से रिश्ता किस हद तक पहुँच चुका है । ये शिद्दत इतनी ज़्यादा हो चली है कि अक्सर जौन को लेकर मेरा मज़ाक भी बनाया जाता है । मगर मुझे इसमे ख़ुशी होती है । मेरे एक दोस्त कहते हैं कि "आप जौन के साथ "तदाकार" हो चुके हैं । अब आप ख़ुद ही समझ सकते हैं मेरी हालत । जौन से हज़ार मुहब्बत के बावजूद , उनके बारे  मे गहराई  तक जानने  के बावजूद भी मैंने कभी जौन की शोहरत से फ़ायदा उठाने की कोशिश नहीं की.....ख़ैर मैं लिखना तो कुछ और चाह रहा था मगर क्या लिखने लग गया । इस पोस्ट का टाइटल जौन के एक शेर का पहला मिसरा है । ये शेर मेरे पसंदीदा शेरों में से एक है । ये कुछ इस तरह है ...........  "लोग मसरूफ़ जानते हैं मुझे यां मेरा ग़म ही मेरी फुर्सत है" सर पीटने की घड़ी है । ग़म भी कभी फुर्सत हुआ करता है । जौन ने जितनी मासूमियत से इंसान के जज़्बात का इज़हार किया है उसकी मिसाल उर्दू शाएरी में कम ही  मिलती ह