कामरेड मुसव्विर हुसैन 'नज्म' की तलाश में

Source: QM Financial
"आपने कामरेड मुसव्विर हुसैन नज्म का नाम सुना है?" "नहीं मियां! मैंने तो नहीं सुना।" "अरे आप ही के मोहल्ले के थे । शायर भी थे ।" "नहीं यार पता नहीं मुझे। किसी बड़े से पता करो!" अमरोहा के मोहल्ला गुज़री में जब कुछ लोगों से मुसव्विर हुसैन नज्म के बारे में पूछताछ की तो मायूसी ही हाथ लगी । सिर्फ़ एक बुजुर्ग से उनके बारे में जो पता लगा वो एक आर्टिक्ल लिखने के लिए नाकाफ़ी था । मगर फिर भी मैं इस कश्मकश में रहा कि कहीं से कुछ मालूम हो जाए । आप सोच रहे होंगे कि मुझे उनके बारे में कहाँ से पता चला । इसका जवाब ये है कि उनसे मेरी मुलाक़ात जॉन एलिया ने कराई । जब पहली मर्तबा जॉन की "शायद" का मुक़दमा पढ़ा तो वहाँ जॉन ने कामरेड मुसव्विर हुसैन का ज़िक्र कुछ इस तरह से किया है .... 

"अमरोहा के इल्मी माहौल में दो मसले सबसे ज़्यादा अहमियत रखते थे । पहला मसला ये था कि ख़ुदा मौजूद है या नहीं? और दूसरा मसला सियासत (राजनीति) से ताल्लुक़ रखता था। यहाँ दो सवाल पैदा होते थे । एक ये कि आया मग़रिबी जम्हूरियत (पश्चिम का लोकतन्त्र) सबसे ज़्यादा इंसान नवाज़ (मानव हित में) है या कम्यूनिज़्म? ये सवाल आज़ादी से पहले भी ज़ेरे बहस रहता था और आज़ादी के बाद भी दो तीन साल तक हमारे शहर का मौज़ू (चर्चा का विषय) रहा । यहाँ मुझे अमरोहे के सबसे मशहूर कम्युनिस्ट और सब गंभीर मुल्हिद (नास्तिक) और अपने भाई सय्यद मोहम्मद तक़ी के इंक़ेलाबी साथी कामरेड मुसव्विर हुसैन याद आ रहे हैं और उनकी याद के साथ मुझे अपने बचपन या लड़कपन की एक महफ़िल की नात याद आ रही है,.........इस महफ़िल में भाई मुसव्विर, इंक़ेलाबी नौजवानों की बीमारी तपेदिक़ (टीबी) में ख़ून थूकने वाले भाई मुसव्विर ने जो नात पढ़ी थी, इस का एक शेर मुझे लड़कपन से याद चला आ रहा है।...
"जो ख़ाक ख़ून हुई थी बरोज़े आशूरा
वो रख गए थे रिसालत मआब शीशे में"
यही वो पैरा था जिसने मेरे दिल और दिमाग़ पर बहुत गहरा असर छोड़ा और नज्म की नामालूम शख़्सियत ने मुझे अपने जादू में जकड़ लिया । मैंने उनके बारे में जानना शुरू किया। कुछ तारीख़ी किताबों के पेज पलटे मगर कुछ हासिल नहीं हुआ । वजह भी साफ़ ज़ाहिर हो रही थी । नज्म का कुछ लोगों ने मौलवी मुसव्विर हुसैन नज्म के नाम से भी ज़िक्र किया । इस बात ने मुझे और परेशान कर दिया । मौलवी और मुल्हिद (नास्तिक)! ये क्यूँ और कैसे हुआ? पता चला की नज्म नजफ़ इराक़ से पढ़कर मौलवी बने थे मगर अमरोहा वापसी पर ज़माने के हालात और बढ़ते हुए कम्यूनिज़्म के रुझान ने उनपर इतना गहरा असर छोड़ा कि अबा अमामा छोड़ कर कम्यूनिज़्म की डगर पर चल पड़े। मैंने उनके मुल्हिद ( नास्तिक) होने की वजह जानने की कोशिश की मगर कोई सुराग़ हाथ न लग सका।


मेरी तलाश अभी भी जारी है। मैं कोशिश करता हूँ मगर लोग ज़्यादा दिलचस्पी से नहीं लेते।इस सिलसिले मेरी अगली मंज़िल था मेरे उस्ताद और कालमनिगार मरहूम डा0 इमाम मुर्तज़ा का ज़ाती कुतुबख़ाना। उनके घर का कूच किया उनके बेटे से मुलाक़ात हुई । मगर वहाँ से भी मायूसी हाथ लगी । उन्होने कहा कि अगर नज्म के हवाले से कुछ भी मालूमात फ़राहम होती है तो वो मुझे ज़रूर इततेला करेंगे। मगर अपनी मसरूफ़ियत के सबब वो मेरी मदद न कर सके ।

सोचने की बात है कि अमरोहा के दूसरे "मशाहीर" की तरह नज्म कोई बहुत बड़ा नाम नहीं था । मगर फिर भी वो मुझे अपनी तरफ़ खींच रहे थे। हक़ीक़त ये है कि उनकी बाग़ीयाना शख़्सियत ने मुझे बहुत मुताससिर किया है । अमरोहा जैसा शहर जहां मज़हब एक डोमिनेंट फ़ेक्टर रहा हो वहाँ मुल्हिद होना और इस हालत में की आप साहिब ए अमामा भी रह चुके हों बहुत मुश्किल और हिम्मतवाला काम है । और इसकी सज़ा नज्म ने भुगती । नज्म ने इसकी सज़ा गुमनामी के अँधेरों में ग़र्क़ होकर भुगती । जहां अमरोहा में रिवायती अदीब, शायर, आलिम, मरसिया निगार बड़े इज्ज़त ओ एहतेराम के साथ याद किए जाते हैं वहाँ नज्म और कामरेड नाज़िश अमरोहवी का कोई नाम लेने वाला भी नहीं । हम अपने पूरे होशो हवास में भी इस बात को कभी क़ुबूल नहीं करेंगे कि हम रिवायत परस्त और शख़्सियत परस्त हैं । और इसी रवैये का असर है कि इज्ज़त मआबों और आलीजनाबों की भीड़ में नज्म और नाज़िश अमरोहवी जैसे लोग गुम हो जाते हैं । भले ही उनका मक़ाम अदब और शाएरी में कमतर हो मगर उनमे रिवायत परस्ती को चेलेंज करने का जो जज़्बा था वो दाद के क़ाबिल है ।

नज्म के हवाले से मैं काफ़ी मायूस हो गया था जब उम्मीद की एक और किरन दिखाई दी । मैं मिज़ाज से बहुत ज़्यादा झेपू रहा हूँ । बहुत आसानी से किसी से अपना मक़सद बयान नहीं कर पाता। मगर फिर भी कोशिश करते हुए मैंने मोहतरम अज़ीम अमरोहवी से नज्म के बारे में पूछने की हिम्मत की। और जैसे कि उम्मीद थी उनसे नज्म के बारे में काफ़ी कुछ जानने को मिला । अज़ीम साहब ने बताया की नज्म क़सीदा गो भी थे । इसके अलावा नज्म को सहाफ़त (पत्रकारिता) में भी दिलचस्पी थी और अमरोहा से ही एक माहनामा "इदराक" के नाम से निकाला करते थे । मैंने पूछा कि क्या उसकी कोई कापी मौजूद नहीं । जवाब वही मिला जिसने मुझे हमेशा परेशान किया है। हो सकता है पाकिस्तान में किसी के पास हो ।ख़ैर पाकिस्तान के बनने का अमरोहा पर क्या असर हुआ ये तफ़सील तलब बात है । अज़ीम साहब से इतनी मालूमात मिलना भी मेरे लिए काफ़ी नहीं था। तजस्सुस और बढ़ गया था। अब जुस्तुजू थी कि कहीं से इदराक के बारे में कुछ पता लगाया जाए मगर कुछ भी हासिल नहीं हुआ । मगर मेरी तलाश अब भी जारी है ।
लोगों को हैरानी हो सकती है कि आख़िर क्यूँ नज्म को लेकर मैं इतनी कोशिश कर रहा हूँ । न वो कोई बहुत बड़े शायर थे ना ही कोई बहुत बड़े मरसिया निगार । वो चाहे कुछ भी थे मगर मेरे लिए वो एक आज़ाद ख़याल शख़्स थे जिसमे एक रिवायत परस्त समाज से बग़ावत करने की हिम्मत थी । और यही चीज़ मुझे उनसे जोड़ने के लिए काफ़ी है । अमरोहा के अशराफ़ियत परस्त शायरों, अदीबों ने मुझे कभी मुतास्सिर नहीं किया । ....

मैं अशराफ़े कमीनाकार को ठोकर पे रखता हूँ
सो मैं मेहनतकशों की जूतियाँ मिंबर पे रखता हूँ ...


(अबू तुराब नक़वी)

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