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Showing posts from October, 2020

कोई दर्द आशना नहीं

पहला भाग चाय का कप हाथ में पकड़े ख़ामोश बैठे रहना और बैठे बैठे सोचते रहना । उसके दिन का ज़्यादातर हिस्सा बस इसी तरह गुज़रता । कहने को शायर मगर एक भी ग़ज़ल काग़ज़ पर नहीं उतरती। सिर्फ़ बैठे बैठे तसव्वुर के कैनवास पर ऊट पटांग तस्वीरें बनाते रहना और फिर उन अधबनी, आड़ी तिरछी तसवीरों को मिटाकर नयी तस्वीरें बनाना। इसी तरह सुबह को दोपहर और दोपहर को शाम कर देना । कहने को तन्हा तन्हा मगर अपने आप से बातें करने में इतना मगन कि किसी को उसके तन्हा होने का एहसास तक न हो। दिन भर लोगों के बीच भीड़ में बैठे रहना मगर फिर भी न किसी से बात करना न ही किसी से मिलना जुलना। बिलकुल अजीब सा किरदार है वो। अपनी कहानी का अकेला किरदार शायद। मैंने तो कभी उसे किसी से इस तरहा मिलते बात करते नहीं देखा। हाँ थोड़ी बहुत किसी साथ के स्टूडेंट से बात कर ली तो उसे बात करना नहीं कहेंगे। यूं हाए हेलो करना और हाल चाल पूछ कर चलो फिर मिलेंगे कहकर अलग हो जाना । ये कोई बात करना या समाजी होना तो नहीं होता। इसी लिए मैंने उसे अपनी कहानी का तन्हा किरदार कहा । रोज़ कैम्पस में दिखता है मगर मैंने कभी भी उससे बात करने की कोशिश नहीं की।